May 21, 2026

गंगरेल बांध:55 गांवों की जमीन लगी,प्रमुख शिल्पी-इंजिनियर सिक्का को ही भुलाया गया…!

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वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से… {किश्त 249 }

धमतरी के गंगरेल बांध निर्माण के लिए 1965 में सर्वे का काम शुरु हुआ था। सबसे पहले सटियारा के पास बांध बनाने जगह की तलाश की गई,तकनीकी कारणों के चलते बांध का निर्माण संभव नहीं हो सका।बाद में वर्तमान गंगरेल गांव के पास दो पहाड़ों के बीच निर्माण करने का निर्णय लिया गया।छग के सबसे लम्बे बांध के रूप में पहचाने जानेवाले रविशंकर जलाशय,को गंगरेल बांध के रूप में जाना जाता है। इसकी सुंदरता देखते ही बनती है,बेहतरीन नजारों के कारण दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं।करीब 1830 मीटर लंबे,100 फीट ऊंचे बांध के पानी से लगभग 57 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है।भिलाई स्टील प्लांट,नई राजधानी नवा रायपुर को भी पानी उपलब्ध कराता है।छत्तीसगढ़ राज्य के बड़े बांधों में से महानदी पर बने गंगरेलबांध के लिए कई लोगों ने अपनी जमीन जायजाद की कुर्बानी दी,इस बात से लोग अंजान हैं।गंगरेल बांध निर्माण में कई गांव डूब में शामिल हो गए। बांध बनने में 6 साल का समय लगा था।55 से अधिक गांव इसके जल ग्रहण क्षेत्र में समा चुके हैं।शिलान्यास 5 मई 1972 को तब की पीएम इंदिरा गांधी ने किया था।बांध की नींव बनाने का काम रेडियो हजरत नाम की कंपनी ने किया।इसके बाद सागर कंपनी, मित्तल एंड कंपनी के साथ ही कुछ अन्य छोटी बड़ी कंपनियों ने कार्य को पूरा किया।इस पूरे निर्माण में इंजीनियर जे डी सिक्का की बड़ी भूमिका रही, कहा जाता है कि पं.श्यामाचरण शुक्ल ने उन्हे आमंत्रित किया था,बांध के निर्माण स्थल पर ही वे रहते थे,बांध के निर्माण में उन्होंने व्यक्तिगत रुचि भी ली थी,बांध बनने के बाद प्रतिनियुक्ति दिल्ली चले भी गये, उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल सकी है,(बड़ी मुश्किल से उनकी फोटो मिल सकी है) कार्यपालन इंजिनियर सिक्का ने कोरबा के निकट हसदेव नदी में एक बहुउद्देश्यीय बांध बनाने की डिजाइन भी अपनी देखरेख में बनवाई थी।हसदेव बांगो बांध 19 61-1962 में छत्तीसगढ़ में हसदेव नदी पर बनाया गया एक बांध है। यह छग का सबसे लंबा,चौड़ा बांध है और छ्ग की पहली जल परियोजना है जिसका उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जा सकता है। यह कोरबा से लगभग 70 किमी दूर है। इसका क्षेत्रफल 6,730 वर्ग किमी है। यह 120 मेगावाट बिजली बना सकता है।लगता है, उनके इसी अच्छे तथा बड़े कार्य के चलते इंजिनियर सिक्का श्यामाचरण शुक्ल के सम्पर्क में आये और उन्हे गंगरेल योजना का प्रभारी बनाया गया था,बाद में श्यामाचरण के हटने के बाद मप्र के सीएम प्रकाश चंद्र सेठी बने और सिक्का को फ्री हेंड नहीं मिला और वे प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चले गये थे।गंगरेल बांध का करीब 6 साल तक लगातार काम चलने के बाद 1978 में बनकर तैयार हुआ। 32.150 टीएमसी क्षमता वाले इस बांध का जल ग्रहण क्षेत्र मीलों तक फैला हुआ है, इसमें धमतरी के अलावा बालोद-कांकेर जिले का भी बड़ा हिस्सा भी शामिल है।बांध अस्तित्व में आया,तब तक 55 गांव जलग्रहण क्षेत्र में समा चुके थे, गंगरेल,चंवर,चापगांव, तुमाखुर्द, बारगरी, कोड़ेगांव मोंगरागहन,सिंघोला,मुड़
पार, कोरलमा,कोकड़ी, तुमाबुजु, कोलियारी, तिर्रा, चिखली कोहका,माटेगहन पटौद, हरफर,भैसमुंडी तासी, तेलगुड़ा, मचाँदूर भिलई,,बरबांधा, सिलतरा, सटियारा समेत अन्य गांवों के लोग ऊपरी क्षेत्रों में बस गए।

16 हजार 704
एकड़ जमीन डूबी..

गंगरेल बांध में जलभराव होने के बाद 55 गांवों के 5 हजार 347 लोगों की 16 हजार 496.62 एकड़ निजी जमीन व 207.58 एकड़ आबादी जमीन सहित कुल 16 हजार 704.2 एकड़ जमीन डूब गई।बारबरी के त्रयंबक राव जाधव,कोड़े गांव के भोपाल राव पवार, कोलियारी के पढ़री राव कृदत्त सहित अन्य माल गुजारों की जमीन शामिल थी।बांध की डूब में आ चुके कई गांवों में अनेक देवी- देवता विराजमान थे,जिनके नाम पर हर साल होने वाले मड़ई मेले काफी मशहूर थे।वर्तमान में बांध के ही एक छोर में स्थापित मां अंगार मोती की मूर्ति पहले करीब 10 किलोमीटर दूर डूब में आ चुके ग्राम चंवर में स्थापित थी।आज इस देवी की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। लमकेनी में देवी मनकेशरी विराजित थी, जिन्हें बाद में कोड़ेगांव में स्थापित किया गया।भिड़ावर में रनवासिन माता, कोरलमा में छिनभंगा माता के मंदिर आसपास के क्षेत्रों में आज भी प्रसिद्ध हैं।

ट्रायबल टूरिस्ट सर्किट

भारत सरकार, पर्यटन मंत्रालय की स्वदेश दर्शन योजना के तहत ‘ट्रायबल टूरिस्ट सर्किट” में छग के जशपुर-कुनकुरी -मैनपाट -कमलेश्वरपुर-महेशपुर-कुरदर-सरोधादादर-गंगरेल-कोण्डागांव-नथियानवागांव-
जगदपुर-चित्रकोट- तीरथगढ़ सहित 13 प्रमुख पर्यटन स्थलों को जोड़ा जाएगा परियोजना के लिए पर्यटन मंत्रालय द्वारा 99 करोड़ स्र्पये स्वीकृत किए गये हैं।

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